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अंबानी के घर के करीब आलीशान फ्लैट किराए पर मिल रहा, जीवनस्तर को दें नई ऊंचाई

मुंबई  मुंबई के पेडर रोड पर स्थित ऐतिहासिक मार्लबोरो हाउस (Marlboro House) इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है. मुकेश अंबानी के आवास 'एंटीलिया' के बेहद करीब स्थित इस बिल्डिंग का एक शानदार 4BHK फ्लैट किराए के लिए उपलब्ध है, जिसका वीडियो इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रहा है।  लग्जरी रियल एस्टेट कंटेंट क्रिएटर गौरव बोधिजा द्वारा शेयर किए गए इस वीडियो में घर के मॉडर्न इंटीरियर और आलीशान डेक की झलक दिखाई गई है. हाल ही में रेनोवेट किए गए इस 4BHK अपार्टमेंट की सबसे बड़ी खूबी इसका गार्डन और डेक है।  यह घर आधुनिक लग्जरी और पुराने दौर की भव्यता का एक अनोखा मिश्रण है. आर्ट डेको (Art Deco) शैली में बनी इस ऐतिहासिक इमारत के वीडियो ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है. 1938 में बनी यह इमारत दक्षिण मुंबई का एक प्रमुख लैंडमार्क है. इसे मशहूर ब्रिटिश आर्किटेक्ट क्लॉड बैटली ने डिजाइन किया था, जिनका बॉम्बे की आधुनिक वास्तुकला में बहुत बड़ा योगदान माना जाता है।  इस घर का इतिहास काफी रोचक है. इसे मूल रूप से एक जर्मन महिला के लिए बनाया गया था, लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के कारण उन्हें भारत छोड़कर जाना पड़ा और वे कभी इस घर में रह नहीं सकीं. बाद में साल 1945 में रामजी हंसराज कमानी ने इस इमारत को खरीद लिया था. फिलहाल इस बिल्डिंग में कुल छह फ्लैट हैं. दक्षिण मुंबई के पेडर रोड जैसी वीआईपी लोकेशन और ऐतिहासिक वास्तुकला की वजह से इस फ्लैट का वीडियो न केवल रियल एस्टेट के शौकीनों के बीच, बल्कि इतिहास प्रेमियों के बीच भी सुर्खियां बटोर रहा है।  कितना है किराया? मार्लबोरो हाउस की पहली मंजिल पर एक आलीशान 4BHK अपार्टमेंट का मासिक किराया 12 लाख रुपये तय किया गया है. करीब 3,000 स्क्वायर फीट में फैले इस घर की सबसे बड़ी खूबी इसका 750 स्क्वायर फीट का निजी गार्डन है, जो मुंबई जैसे घने शहर में एक दुर्लभ विलासिता है. इस अपार्टमेंट में तीन मुख्य बेडरूम, चार बाथरूम और एक पाउडर रूम के साथ-साथ दो कारों की पार्किंग और सर्वेंट क्वार्टर की सुविधा भी दी गई है।  यहां रहने वाले किरायेदारों को पिकल-बॉल कोर्ट जैसी आधुनिक सुविधाएं भी मिलेंगी. हालांकि, इस प्राइम लोकेशन पर रहने के लिए जेब अच्छी-खासी ढीली करनी होगी, क्योंकि किराए के साथ ही किरायेदारों को 6 महीने का किराया (करीब 72 लाख रुपये) सिक्योरिटी डिपॉजिट के तौर पर जमा करना होगा। 

प्रदेश में अधोसंरचना और उद्योगों के समन्वित विस्तार को मिलेगा सशक्त आधार

भोपाल  मध्यप्रदेश में औद्योगिक प्रगति को नई गति देने और निवेश के लिए दीर्घकालिक आधार तैयार करने की दिशा में इन्दौर-पीथमपुर इकोनॉमिक कॉरिडोर का प्रथम चरण एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में स्थापित हो रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव आगामी 2 मई को इस परियोजना के प्रथम चरण का भूमि-पूजन करेंगे। यह कॉरिडोर केवल एक सड़क परियोजना नहीं, बल्कि प्रदेश की आर्थिक संरचना को अधिक संगठित, सक्षम और निवेश का आदर्श गंतव्य बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा, जिसमें अधोसंरचना, उद्योग और शहरी विकास को एकीकृत रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। प्रदेश में निवेश आकर्षित करने के लिए प्रक्रियाओं के सरलीकरण, नीति समर्थन और बेहतर कनेक्टिविटी पर लगातार कार्य किया जा रहा है। इन्दौर-पीथमपुर इकोनॉमिक कॉरिडोर इसी क्रम में एक ऐसा विकास मॉडल प्रस्तुत करता है, जहां औद्योगिक गतिविधियों, वाणिज्यिक विस्तार और नागरिक सुविधाओं का संतुलित समावेश सुनिश्चित किया गया है। यह परियोजना निवेशकों को एक सुव्यवस्थित, पूर्व नियोजित और अधोसंरचना से परिपूर्ण स्थान उपलब्ध कराएगी, जिससे उद्योगों की स्थापना और विस्तार की प्रक्रिया अधिक सुगम हो सकेगी। कनेक्टिविटी आधारित विकास: लॉजिस्टिक्स दक्षता और क्षेत्रीय संतुलन को बढ़ावा इंदौर-पीथमपुर इकॉनामिक कॉरिडोर 20.28 कि.मी. लंबाई में फैलाव के साथ इन्दौर एयरपोर्ट के समीप सुपर कॉरिडोर को पीथमपुर निवेश क्षेत्र से सीधे जोड़ेगा। परियोजना का विस्तार 1316 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रस्तावित है, जिसके समुचित विकास के लिए कुल 2360 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। अधोसंरचना की दृष्टि से 75 मीटर चौड़ी मुख्य सड़क के साथ दोनों ओर सुव्यवस्थित बफर ज़ोन विकसित किया जाएगा, जो इस कॉरिडोर को एक आधुनिक, सुरक्षित और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप विस्तार योग्य स्वरूप प्रदान करेगा। यह मार्ग एनएच-47 और एनएच-52 को जोड़ते हुए न केवल इन्दौर शहर के यातायात दबाव को कम करेगा, बल्कि माल परिवहन की गति और विश्वसनीयता को भी बढ़ाएगा। इस कनेक्टिविटी का प्रभाव केवल आवागमन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह औद्योगिक इकाइयों के लिए लागत में कमी, समय की बचत और सप्लाई चेन की दक्षता में सुधार के रूप में भी सामने आएगा, जो निवेशकों के लिए एक महत्वपूर्ण आकर्षण का केंद्र बनेगा। निवेश सशक्तिकरण का आधार : औद्योगिक क्लस्टर्स का एकीकरण इन्दौर-पीथमपुर इकोनॉमिक कॉरिडोर, पीथमपुर निवेश क्षेत्र, मल्टी मॉडल लॉजिस्टिक पार्क, पीएम मित्र पार्क और विक्रम उद्योगपुरी जैसे प्रमुख औद्योगिक स्थानों को एकीकृत रूप में जोड़ते हुए एक मजबूत औद्योगिक नेटवर्क तैयार करेगा। इस प्रकार का समेकित विकास निवेशकों को अलग-अलग स्थानों के बजाय एक संगठित इकोसिस्टम में कार्य करने का अवसर प्रदान करता है, जहां कनेक्टिविटी, संसाधन और बाजार तक पहुंच एक साथ उपलब्ध होती है। इससे बड़े निवेश प्रस्तावों को गति मिलेगी और प्रदेश में औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार अधिक सुव्यवस्थित ढंग से हो सकेगा। साथ ही, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए भी बड़े उद्योगों के साथ जुड़कर आगे बढ़ने के अवसर विकसित होंगे। सेक्टर-आधारित विकास: आईटी, मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स को नई ऊर्जा यह कॉरिडोर इन्दौर को आईटी और फिनटेक गतिविधियों के लिए एक सशक्त स्थान के रूप में स्थापित करने की दिशा में सहायक सिद्ध होगा। इसके साथ ही मैन्युफैक्चरिंग, ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल, एमएसएमई और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में भी विकास की गति तेज होने की संभावनाएं हैं। प्रदेश की भौगोलिक स्थिति और इन्दौर की स्थापित औद्योगिक पहचान को ध्यान में रखते हुए यह परियोजना विभिन्न सेक्टरों के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करती है। लॉजिस्टिक्स लागत में कमी, तेज कनेक्टिविटी और नियोजित अधोसंरचना उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को बढ़ाएगी, जिससे प्रदेश राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत औद्योगिक केंद्र के रूप में उभर सकेगा। संतुलित शहरीकरण और भविष्य उन्मुख अधोसंरचना का विकास इन्दौर-पीथमपुर इकोनॉमिक कॉरिडोर, उज्जैन-इन्दौर मेट्रोपॉलिटन रीजन में एक महत्वपूर्ण विकास धुरी के रूप में कार्य करेगा। यह परियोजना केवल औद्योगिक विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके अंतर्गत वाणिज्यिक, आवासीय और सार्वजनिक उपयोग की भूमि का भी नियोजित विकास किया जाएगा, जिससे एक संतुलित और सुव्यवस्थित शहरी संरचना विकसित हो सके। भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए यह कॉरिडोर बहुविकल्पीय कनेक्टिविटी, ट्रैफिक प्रबंधन और बड़े आयोजनों के दौरान सुचारू आवागमन सुनिश्चित करने में भी सहायक होगा। इस प्रकार यह परियोजना दीर्घकालिक शहरी और आर्थिक विकास के लिए एक मजबूत आधार तैयार करती है। इन्दौर-पीथमपुर इकोनॉमिक कॉरिडोर प्रदेश में औद्योगिक विकास, निवेश आकर्षण और शहरी विस्तार को एकीकृत रूप में आगे बढ़ाने की दिशा में एक सशक्त पहल के रूप में उभर रहा है, जो मध्यप्रदेश को एक संतुलित, सक्षम और प्रतिस्पर्धी आर्थिक प्रणाली की ओर अग्रसर करेगा।  

इंदौर में बनेगा प्रदेश का पहला क्वांटम कंप्यूटर, हाई टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बड़ा कदम

इंदौर  मध्यप्रदेश हाईटेक टेक्नोलॉजी की दौड़ में बड़ी छलांग लगाने जा रहा है। श्री गोविंदराम सेकसरिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (SGSITS) में 3 साल में क्वांटम कम्प्यूटर तैयार होंगे। ये कम्प्यूटर रूम टेम्परेचर पर काम करेंगे। ऐसा करने वाला यह मध्यप्रदेश (MP)का इकलौता संस्थान होगा। यह तकनीक नई दवाइयों की खोज में मददगार होगी। अभी दवाइयों की खेाज में वर्षों लगते हैं। यह सिस्टम अणुओं के व्यवहार को सटीक सिमुलेट करेगा। दुर्लभ बीमारियों की दवा जल्द बन सकेगी। इंटरनेट सुरक्षा ज्यादा मजबूत होगी। साइबर सिक्योरिटी बढ़ेगी। ट्रैफिक, फ्लाइट शेड्यूल में आ रहीं ऑप्टिमाइजेशन की समस्या भी यह हल करेगा। इससे ईंधन बचेगा। 8000 से ज्यादा आवेदन आए देश के 23 संस्थानों में एक हमारे देश में नेशनल क्वांटम मिशन के तहत क्वांटम कम्यूप्टिंग लैब के लिए 8000 से ज्यादा आवेदन आए। इनमें से 23 संस्थान चुने। ज्यादातर आइआइटी-ट्रिपल आइटी हैं। मध्यप्रदेश से राज्य इंजीनियरिंग कॉलेज SGSITS को चुना। संस्थानों को डिपार्टमेंट ऑफ साइंस-टेक्नोलॉजी (डीएसटी) 1-1 करोड़ रुपए फंड देगा। स्टूडेंट्स को मिलेंगे नए कोर्स और ड्यूल डिग्री के अवसर संस्थान में क्वांटम कम्प्यूटिंग की पढ़ाई और रिसर्च को बढ़ावा दिया जा रहा है। यहां पहले से 15 सीटों पर एमटेक इन क्वांटम कम्प्यूटिंग कोर्स चल रहा है। अब बीटेक में 20 क्रेडिट का माइनर प्रोग्राम शुरू होगा। हर सेमेस्टर 5-5 क्रेडिट दिए जाएंगे। इस कोर्स में 30 सीटें रहेंगी। इसे करने वाले छात्रों को बीटेक के साथ अतिरिक्त डिग्री मिलेगी। राजीव गांधी प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय (RGPV) से जुड़े छात्र ड्यूल डिग्री प्रोग्राम में भी हिस्सा ले सकेंगे। स्टार्टअप-रिसर्च को बढ़ावा क्वांटम कम्प्यूटिंग इंटर डिसिप्लिनरी क्षेत्र। इसमें कम्प्यूटर साइंस, आइटी, इलेक्ट्रॉनिक्स, फिजिक्स और मैथ्स जैसे विषयों के विशेषज्ञ मिलकर काम करेंगे।     लैब में छात्रों को क्वांटम डिवाइस बनाने की ट्रेनिंग।     इंटर्नशिप और स्टार्टअप शुरू करने में भी मदद मिलेगी।     संस्थान क्वांटम मटेरियल पर भी काम करेगा। देश में ऐसा…     देश में क्वांटम टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने 4 बड़े हब आइआइटी दिल्ली, बॉम्बे, चेन्नई और खडग़पुर पहले से काम कर रहे हैं।     उन्हें स्टार्टअप और रिसर्च के लिए 800 करोड़ फंड दिया। 8 स्टार्टअप शुरू।     आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू सरकार ने बड़ा निवेश किया।     40 क्यूबिट का सिस्टम स्थापित किया है। विश्व में 1000 क्यूबिट तक के क्वांटम कम्प्यूटर। टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बड़ा कदम यह प्रोजेक्ट मध्यप्रदेश (MP) ही नहीं, देश के लिए भी टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बड़ा कदम साबित होगा। आने वाले 3 साल में लक्ष्य पूरा होने पर इंदौर क्वांटम टेक्नोलॉजी का प्रमुख केंद्र बनकर उभरेगा। -जेटी एंड्रूस थॉमस, एचओडी, फिजिक्स, एसजीएसआइटीएस

मध्यप्रदेश में इंजीनियरिंग शिक्षा में बदलाव, 64 कॉलेजों के बंद होने से शिक्षा पर असर

भोपाल  मध्यप्रदेश में इंजीनियरिंग शिक्षा का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। प्लेसमेंट के घटते अवसर और पारंपरिक ब्रांचों में छात्रों की कम होती रुचि ने कई कॉलेजों के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यही वजह है कि इस साल भी कई इंजीनियरिंग कॉलेज सीटें सरेंडर करने की तैयारी में हैं। पिछले साल प्रदेश में 754 सीटें सरेंडर की गई थीं। हाल इतने बुरे हैं कि बीते 10 सालों में प्रदेश के 64 इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हो चुके हैं। दूसरी ओर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ), मशीन लर्निंग (एमएल) और ई-मोबिलिटी जैसी आधुनिक ब्रांचों की मांग लगातार बढ़ रही है। इसके चलते कॉलेज इन क्षेत्रों में सीटें बढ़ाने के लिए तकनीकी शिक्षा विभाग को प्रस्ताव भेज रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि अब छात्र और अभिभावक केवल उन्हीं संस्थानों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जहां बेहतर प्लेसमेंट की गारंटी हो। इससे छोटे और कम पहचान वाले कॉलेजों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है। विशेषज्ञों के मुताबिक प्रदेश के इंजीनियरिंग क्षेत्र में जबर्दस्त बदलाव आ रहा है। एक ओर जहां इंजीनियरिंग कॉलेजों में ताला लग रहा है, 5 दर्जन से ज्यादा कॉलेज बंद हो चुके हैं वहीं नए कोर्सेस की डिमांड बढ़ भी रही है। प्लेसमेंट के दबाव से यह स्थिति बन रही है। नई ब्रांच में रुचि, पुरानी में गिरावट प्रदेश में इंजीनियरिंग की कुल 75722 सीटों में से पिछले साल सबसे ज्यादा 20 हजार से अधिक एडमिशन केवल कंप्यूटर साइंस (सीएसई) में हुए। इसके विपरीत, कई पारंपरिक और विशेष ब्रांचों की हालत बेहद खराब रही। एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग, बायोटेक्नोलॉजी, साइबर सिक्योरिटी, ई व्हीकल्स जैसी 12 ब्रांचों में पिछले दो साल से सीटें लगभग खाली रहीं। बदलती प्राथमिकताएं: 2015-16 में जहां प्रदेश में 200 इंजीनियरिंग कॉलेज और करीब 95 हजार सीटें थीं, वहीं 2025-26 में यह संख्या घटकर 138 कॉलेज और 74722 सीटों तक सिमट गई है। यह गिरावट स्पष्ट संकेत देती है कि इंजीनियरिंग शिक्षा अब केवल संख्या का खेल नहीं रह गया, बल्कि गुणवत्ता और रोजगार से सीधे जुड़ गई है। प्रमुख बिंदु इंजीनियरिंग क्षेत्र में जबर्दस्त बदलाव एमपी के इंजीनियरिंग कॉलेजों में लग रहा ताला एक दशक में 5 दर्जन से ज्यादा कॉलेज बंद हुए प्लेसमेंट के दबाव से स्थिति बदली स्टूडेंट का नई ब्रांच की ओर रुझान एआइ की सबसे ज्यादा डिमांड इंजीनियरिंग की पुरानी सीटें सरेंडर कर रहे कॉलेज नए कोर्सेस के लिए भेजे प्रस्ताव दस साल में स्थिति सत्र -कॉलेज- सीट 2025-26- 138- 74722 2024-25- 142- 63338 2023-24- 140- 71400 2022-23- 143- 69966 2020-21- 150- 56008 2019-20- 162- 59000 2018-19- 160- 65000 2017-18- 197- 79899 2016-17- 194- 90303 2015-16- 200- 94980  

‘आप इस जमाने की होकर 5 बच्चे कर रही हो’, IAS विदिशा मुखर्जी ने प्रसूता पर किया तीखा बयान

 मैहर मध्य प्रदेश के मैहर की कलेक्टर IAS बिदिशा मुखर्जी इन दिनों अपने सख्त और संवेदनशील तेवरों के लिए चर्चा में हैं. हाल ही में जब वे मैहर के सिविल अस्पताल का औचक जायजा लेने पहुंचीं, तो वहां का नजारा देख वह खुद को रोक नहीं पाईं और एक 'सुपर वुमेन' की तरह समाज की कुरीतियों पर दहाड़ती नजर आईं. पांचवें बच्चे का जन्म सुनकर दंग रह गईं… अस्पताल के मेटरनिटी वार्ड में निरीक्षण के दौरान कलेक्टर को जब यह पता चला कि एक महिला ने अपने पांचवें बच्चे को जन्म दिया है, तो वे दंग रह गईं।  उन्होंने महिला के पास जाकर बड़ी ही आत्मीयता, लेकिन दृढ़ता के साथ उसे समझाइश दी कि आज के महंगाई के दौर में इतने बच्चों का पालन-पोषण, उनकी अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य का ध्यान रखना कितना चुनौतीपूर्ण है. कलेक्टर ने महिला से सीधे सवाल किया कि आखिर इतने बड़े परिवार का भविष्य कैसे सुरक्षित होगा? ​ अस्पताल में उनके इस तेवर ने वहां मौजूद कर्मचारियों और मरीजों के परिजनों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया. यह पूरा घटनाक्रम समाज की उस गहरी सोच पर प्रहार करता है जहां आज भी 'पुत्र प्राप्ति' या अन्य सामाजिक कारणों से लगातार बच्चे पैदा किए जाते हैं।  महिला सशक्तिकरण का दिया उदाहरण कलेक्टर ने समाज को आईना दिखाते हुए कहा कि आज जमाना बदल गया है. उन्होंने उदाहरण दिया कि "आज मध्य प्रदेश में 31% कलेक्टर महिलाएं हैं, हमारी पूरी टीम महिलाओं की है. फिर यह भेदभाव क्यों?" ग्राउंड स्टाफ को फटकार उन्होंने केवल महिला को ही नहीं टोका, बल्कि स्वास्थ्य विभाग के अमले और मैदानी कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर भी कड़े सवाल दागे. कलेक्टर ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि आखिर परिवार नियोजन को लेकर जागरूकता अभियान कहां है? उन्होंने साफ शब्दों में निर्देश दिए कि विभाग सिर्फ कागजों पर काम न करे, बल्कि जमीनी स्तर पर लोगों को छोटे परिवार के फायदों और मातृ स्वास्थ्य के महत्व के बारे में जागरूक करे।  कलेक्टर ने अस्पताल में मिल रहे भोजन की क्वालिटी की भी जांच की और स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के निर्देश दिए।   उन्होंने मीडिया से बात करते हुए यह भी स्वीकार किया कि मैहर एक नया जिला है और यहां महिला रोग विशेषज्ञ, नेफ्रोलॉजिस्ट और ऑर्थोपेडिक सर्जन जैसे विशेषज्ञों की कमी एक बड़ी चुनौती है, जिसे दूर करने के लिए वे निरंतर प्रयास कर रही हैं। 

भोजशाला विवाद में नया मोड़, मुस्लिम पक्ष ने MP हाई कोर्ट में 1935 के धार रियासत के फैसले का किया हवाला

 इंदौर/धार मध्य प्रदेश के धार जिले स्थित ऐतिहासिक स्मारक भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद मामले में मुस्लिम पक्ष ने हाई कोर्ट के सामने एक अहम दस्तावेज पेश किया है. सीनियर वकील शोभा मेनन ने दावा किया कि तत्कालीन धार रियासत की अदालत ने 24 अगस्त 1935 को एक 'ऐलान' जारी कर इस परिसर को आधिकारिक रूप से 'मस्जिद' घोषित किया था।  वकील शोभा मेनन ने हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी के सामने मुस्लिम समुदाय के मुनीर अहमद और अन्य लोगों की ओर से दायर हस्तक्षेप याचिका और रिट अपील के समर्थन में दलीलें पेश कीं।  1935 के 'ऐलान' का दावा मुस्लिम समुदाय की ओर से पैरवी करते हुए वकील शोभा मेनन ने दलील दी कि 1935 का यह आदेश एक राजपत्र (Gazette) के समान था, जिसमें शर्त रखी गई थी कि भविष्य में भी यहां नमाज अदा की जाती रहेगी।  उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि इस मामले को धार्मिक चश्मे से देखने के बजाय 'कानून के स्थापित सिद्धांतों' और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर परखा जाए. बता दें कि ब्रिटिश राज के दौरान धार मध्य भारत में भोपाल एजेंसी के अधीन एक रियासत थी।  मेनन ने हाई कोर्ट से आग्रह किया कि वह भोजशाला विवाद को धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि कानून के सिद्धांतों के आधार पर परखे. उन्होंने विरोधाभासों की ओर इशारा करते हुए पिछले कुछ वर्षों में भोजशाला के धार्मिक स्वरूप को लेकर दायर अदालती मामलों में मध्य प्रदेश सरकार और ASI की ओर से अलग-अलग समय पर व्यक्त की गई भिन्न-भिन्न राय का हवाला दिया।  शोभा मेनन ने कहा कि इस तरह बार-बार बदलते रुख कानून की नजर में असंगत, मनमाने और अस्वीकार्य हैं, क्योंकि सरकार से एक सुसंगत और स्थिर दृष्टिकोण अपनाने की उम्मीद की जाती है।  जनहित याचिकाओं पर सवाल उन्होंने भोजशाला मामले में 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' नामक संगठन कुलदीप तिवारी और एक अन्य व्यक्ति की ओर से दायर दो जनहित याचिकाओं पर सवाल उठाए. इन याचिकाओं में कहा गया है कि भोजशाला असल में एक सरस्वती मंदिर है और इस परिसर में पूजा-अर्चना का अधिकार केवल हिंदुओं को ही मिलना चाहिए।  इन PILs की स्वीकार्यता पर सवाल उठाते हुए मेनन ने तर्क दिया कि भोजशाला विवाद को व्यापक जनहित का मामला मानना ​​कानूनी रूप से सही नहीं है, क्योंकि यह मुख्य रूप से एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय से जुड़ा मामला है।  भोजशाला मामले में सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी. हाई कोर्ट 6 अप्रैल से लगातार चार याचिकाओं और एक रिट अपील पर सुनवाई कर रहा है, जिनमें इस स्मारक के धार्मिक स्वरूप को चुनौती दी गई है।  हिंदू समुदाय धार जिले में स्थित भोजशाला को देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद होने का दावा करता है. यह विवादित परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है। 

यूरिया खाद पर किचकिच खत्म, 100 लाख टन के गैप को भरने के लिए नई पॉलिसी लांच

नई दिल्ली  भारत सरकार देश में खेती के लिए सबसे जरूरी यूरिया (Urea) खाद की कमी को दूर करने के लिए एक बड़ा कदम उठाने जा रही है. सरकार ने एक नई निवेश नीति तैयार की है, जिसके लिए एक कैबिनेट नोट भी बना लिया गया है. इस नई नीति का मुख्य मकसद देश में यूरिया के नए कारखाने लगाने के लिए कंपनियों को प्रोत्साहित करना है, ताकि विदेशों से खाद न मंगानी पड़े. फिलहाल भारत में यूरिया की जितनी जरूरत है और जितनी पैदावार हो रही है, उसके बीच करीब 100 लाख मीट्रिक टन का बड़ा अंतर है. इसी अंतर को भरने के लिए सरकार अब नई सुविधाओं और नियमों का ऐलान करने वाली है. मनीकंट्रोल की रिपोर्ट में यह बात कही गई है।  भारत में हर साल लगभग 380 से 400 लाख मीट्रिक टन यूरिया की जरूरत होती है, लेकिन देश में मौजूद कारखाने केवल 300 लाख मीट्रिक टन ही बना पाते हैं. इसका मतलब है कि हमें अपनी कुल जरूरत का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा दूसरे देशों से खरीदना पड़ता है. रिपोर्ट में एक सरकारी अधिकारी के हवाले से बताया गया है कि यूरिया की कीमतों पर सरकार का नियंत्रण होता है, इसलिए नई कंपनियां तब तक पैसा लगाने से डरती हैं जब तक उन्हें यह पता न हो कि उन्हें सरकार से कितनी सब्सिडी (Subsidy) मिलेगी. नई नीति में अगले 8 सालों के लिए सब्सिडी की न्यूनतम और अधिकतम सीमा तय की जाएगी, जिससे निवेशकों को भविष्य का अंदाजा मिल सके और वे बेझिझक नए प्लांट लगा सकें।  पुरानी नीति का असर इससे पहले साल 2012 में नई निवेश नीति (New Investment Policy – 2012) आई थी. उस नीति की वजह से देश में छह नए यूरिया कारखाने लगे थे, जिनमें गोरखपुर (Gorakhpur), सिंदरी (Sindri), बरौनी (Barauni), रामागुंडम (Ramagundam), पानागढ़ (Panagarh) और गड़ेपान (Gadepan) शामिल हैं. इन कारखानों से यूरिया की पैदावार काफी बढ़ी थी, लेकिन अब उस पुरानी नीति का समय खत्म हो गया है और मांग लगातार बढ़ती जा रही है।  नई नीति के तहत सरकार कंपनियों को कारखाना लगाने के लिए सीधे पैसे नहीं देगी, बल्कि एक ऐसा ढांचा तैयार करेगी जिससे कंपनियों को मुनाफा मिल सके. कंपनियों को आमतौर पर नीति लागू होने के चार साल के भीतर कारखाना चालू करना होगा. वर्तमान में किसानों को यूरिया का एक बैग (45 किलो) लगभग 266 रुपये में मिलता है, जबकि इसे बनाने का खर्च 1,200 से 1,700 रुपये तक आता है. इस बीच का जो भी बड़ा अंतर है, वह सरकार सब्सिडी के तौर पर चुकाती है।  गैस की उपलब्धता जरूरी यूरिया बनाने के लिए गैस की जरूरत होती है, जो काफी महंगी और सीमित है. अधिकारियों का कहना है कि भले ही हम देश में बहुत सारे कारखाने लगा लें, लेकिन अगर उनके पास पर्याप्त गैस नहीं होगी, तो फिर से दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ेगा. इसके अलावा, वैश्विक बाजार में खाद की कीमतें लगातार ऊपर-नीचे हो रही हैं, जिससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है।  बजट में सब्सिडी के लिए करीब 1.7 लाख करोड़ रुपये रखे गए थे, लेकिन अनुमान है कि यह खर्च बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है. यूरिया के अलावा अन्य खादों जैसे एनपीके (NPK – Nitrogen, Phosphorus, Potassium) के नियम थोड़े अलग हैं, वहां सरकार एक तय मदद देती है और कंपनियां बाजार के हिसाब से दाम तय करती हैं, लेकिन यूरिया में पूरी जिम्मेदारी सरकार की होती है. नई नीति आने से उम्मीद है कि आने वाले सालों में भारत यूरिया के मामले में आत्मनिर्भर बन पाएगा। 

हरी खाद से खेती में बढ़ेगा उत्पादन, मिट्टी की सेहत में सुधार की उम्मीद

हरी खाद- खेती में बढ़ेगा उत्पादन, मिट्टी की सेहत होगी बेहतर              रायपुर आज के दौर में टिकाऊ खेती की ओर बढ़ना समय की मांग है। रसायनों के बोझ तले दबती मिट्टी को राहत देने के लिए हरी खाद एक बेहतरीन समाधान बनकर उभरी है। यह न केवल फसलों की पैदावार बढ़ाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन की उर्वरता को भी सुरक्षित रखती है। मिट्टी बचेगी, तो किसान बचेगा और किसान बचेगा, तो देश समृद्ध होगा।          कृषि विभाग द्वारा किसानों को खेती में हरी खाद के उपयोग के लिए प्रेरित किया जा रहा है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और उत्पादन में सुधार लाने में मदद मिल सके। विभाग के अनुसार धान के खेतों में लगातार रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग से मिट्टी में लाभदायक सूक्ष्म जीवों की गतिविधियां कम हो रही हैं और मिट्टी की संरचना भी प्रभावित हो रही है। क्या है हरी खाद?        हरी खाद वह सहायक फसल है जिसे मुख्य फसल बोने से पहले खेत में उगाया जाता है और फूल आने की अवस्था में ही उसे हल चलाकर मिट्टी में दबा दिया जाता है। ढैंचा, सनई, लोबिया, मूंग और उड़द जैसी फसलें हरी खाद के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं। हरी खाद के तहत कई फसलों का उपयोग किया जाता है जिनमें दलहनी और बिना दलहनी फसलें शामिल होती हैं। हरी खाद के लिए झाड़ियों और पेड़ों की पत्तियों, टहनियों को भी उपयोग में ला सकते हैं, लेकिन इसके लिए विशेष रूप से ढैंचा फसलों का उपयोग किया जाता है। इन फसलों को खेतों में लगाकर भूमि में सुधार किया जाता है। मिट्टी की सेहत में सुधार       हरी खाद का सबसे बड़ा प्रभाव मिट्टी की भौतिक और रासायनिक संरचना पर पड़ता है। यह मिट्टी में नाइट्रोजन और कार्बनिक पदार्थों (ह्यूमस) की मात्रा को तेजी से बढ़ाती है। हरी खाद मिट्टी को भुरभुरा बनाती है, जिससे हवा का संचार बढ़ता है और पौधों की जड़ें गहराई तक जा पाती हैं। इसके उपयोग से मिट्टी की पानी सोखने की शक्ति बढ़ जाती है, जो सूखे के समय फसलों के लिए जीवन रक्षक साबित होती है। उत्पादन में वृद्धि और लागत में कमी         जब मिट्टी स्वस्थ होती है, तो उत्पादन का बढ़ना निश्चित है। हरी खाद के प्रयोग से पैदावार में 15 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी जा सकती है। यूरिया और अन्य रासायनिक खादों पर निर्भरता कम हो जाती है, जिससे किसान की फसल की लागत घटती है। मित्र कीटों से फसल का संरक्षण करता है। यह जमीन के भीतर लाभकारी सूक्ष्मजीवों और केंचुओं की संख्या बढ़ाने में मदद करती है। हरी खाद बनाने की सही विधि       क्षेत्र की जलवायु के अनुसार सनई या ढैंचा का चुनाव करें। बुवाई का समय मानसून की शुरुआत (जून-जुलाई) इसके लिए सबसे उपयुक्त है। जब फसल लगभग 40-50 दिन की हो जाए और उसमें फूल आने लगें, तब उसे पाटा लगाकर या रोटावेटर की मदद से मिट्टी में मिला दें। पलटने के बाद 10-15 दिनों तक खेत में नमी बनाए रखें ताकि खाद अच्छी तरह सड़कर मिट्टी का हिस्सा बन जाए। हरी खाद के प्रयोग से  बढ़ेगी आय         हरी खाद केवल एक उर्वरक नहीं है, बल्कि यह मिट्टी का उपचार है। यदि किसान हर दूसरे या तीसरे साल अपने खेत में हरी खाद का प्रयोग करें, तो न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि हम समाज को रसायनों से मुक्त, शुद्ध और पौष्टिक अनाज भी उपलब्ध करा पाएंगे। कृषि के लिए एक वरदान हरी खाद            हरी खाद का उपयोग कृषि के लिए एक ष्वरदानष् के समान है। वर्तमान समय में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो रही है, ऐसे में हरी खाद (ळतममद डंदनतम) प्राकृतिक तरीके से मिट्टी को पुनर्जीवित करने का सबसे सुलभ विकल्प है।                कृषि विभाग द्वारा खरीफ फसल से पूर्व हरी खाद के बीज उपलब्ध कराने की भी पहल की जा रही है। इसके लिए क्षेत्रीय ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों के माध्यम से किसानों से मांग लेकर बीज उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है।               धनंजय राठौर         संयुक्त संचालक जनसंपर्क 

पाकिस्तानी एक्ट्रेस का विवादित बयान: ’40 साल पार पत्नी की उम्र हो, तो दूसरी शादी कर सकता है मर्द’

लाहौर  इसपर होस्ट ने उनसे पूछा कि पहली पत्नी के होते हुए मर्दों को दूसरी शादी कर लेनी चाहिए? इस पर शमीन ने जवाब दिया- अगर औरत की उम्र 40 पार हो चुकी है और उसके हसबैंड को अब रिश्ता आगे समझ नहीं आ रहा है और वो अपनी पत्नी के साथ खुश नहीं है. उसे लगता है कि उसे दूसरी शादी कर लेनी चाहिए तो इसमें कोई बुराई नहीं है. मर्द अपनी पत्नी से इजाजत लेकर दूसरी शादी कर सकते हैं. लेकिन शादी के बाद मैं एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स के हक में नहीं हूं।  पीछे पड़े ट्रोल्स पॉडकास्ट से शमीन खान की क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है. फैंस उन्हें जमकर लताड़ रहे हैं. एक यूजर ने लिखा- शादी मजे लेने की चीज नहीं है. ये एक जिम्मेदारी है. दूसरे ने पूछा- अगर औरत को मर्द पसंद न हो तो वो क्या करे? एक और यूजर ने कहा- ये बोलने के लिए शमीन को जेल में डाल देना चाहिए।  कौन हैं शमीन खान? 30 साल की शमीन खान एक पाकिस्तानी टीवी एक्ट्रेस हैं. वो कुछ फिल्में भी कर चुकी हैं. साल 2019 में उन्होंने फिल्म 'गुम' (Gumm) से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी. इसके अलावा वो टीवी शोज 'गोहर-ए-नायाब', 'हिना की खुशबू', 'धड़कन', 'भरोसा प्यार तेरा' और 'खुदा और मोहब्बत 3' जैसे सीरियल्स में नजर आ चुकी हैं। 

2646 नर्सिंग ऑफिसर और सिस्टर ट्यूटर पदों पर भर्ती, हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद आवेदन फिर से शुरू

जबलपुर  मध्यप्रदेश में नर्सिंग क्षेत्र के अभ्यर्थियों के लिए एक बार फिर भर्ती प्रक्रिया शुरू हो गई है। नर्सिंग ऑफिसर और सिस्टर ट्यूटर के 2,646 पदों के लिए संयुक्त भर्ती परीक्षा-2026 आयोजित की जा रही है। यह भर्ती लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के अंतर्गत होगी, जिसका संचालन मध्यप्रदेश कर्मचारी चयन मंडल (ESB) द्वारा किया जाएगा। खास बात यह है कि इस भर्ती से जुड़े मामलों में उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश के तहत अभ्यर्थियों को आवेदन करने की अनुमति दी गई है। उम्मीदवारों को आवेदन प्रक्रिया, पात्रता और अन्य शर्तों को ध्यानपूर्वक समझकर ही आवेदन करना होगा। इस भर्ती से संबंधित विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत देते हुए आवेदन करने की अनुमति दी है। इसके तहत पात्र याचिकाकर्ता अभ्यर्थी 29 अप्रैल से 3 मई 2026 तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। यह अवसर केवल उन्हीं अभ्यर्थियों के लिए है, जो संबंधित याचिकाओं में शामिल हैं। प्रोविजनल रहेगी अभ्यर्थिता, परिणाम पर रोक उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार इन याचिकाकर्ता अभ्यर्थियों की अभ्यर्थिता पूरी तरह प्रावधिक (प्रोविजनल) रहेगी। इसके साथ ही, उनके परीक्षा परिणाम अंतिम निर्णय आने तक रोके (Withheld) रखे जाएंगे। यानी चयन प्रक्रिया में शामिल होने के बावजूद अंतिम नियुक्ति न्यायालय के फैसले पर निर्भर करेगी। गलत जानकारी देने पर रद्द होगी अभ्यर्थिता आवेदकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि आवेदन पत्र में दी गई सभी जानकारी पूरी तरह सही और सत्य हो। किसी भी स्तर पर जानकारी गलत या भ्रामक पाए जाने पर अभ्यर्थिता निरस्त कर दी जाएगी। साथ ही, निर्धारित समय सीमा में आवेदन नहीं करने पर अभ्यर्थी परीक्षा में शामिल नहीं हो सकेंगे, जिसकी जिम्मेदारी स्वयं उम्मीदवार की होगी। संयुक्त भर्ती में 2,646 पद भरे जाएंगे मध्यप्रदेश में संयुक्त भर्ती में 2,646 पद भरे जाएंगे। नर्सिंग ऑफिसर के 1,256 पद सरकारी अस्पतालों में और 954 पद सरकारी मेडिकल कॉलेजों में भरे जाएंगे। सिस्टर ट्यूटर के 218 पद भी इसी संयुक्त परीक्षा से भरे जाएंगे। पदों का स्वरूप और सैलरी नर्सिंग ऑफिसर- लेवल-7, वेतनमान 28,700 रुपए। यह पद नियमित और तृतीय श्रेणी सेवा के अंतर्गत आते हैं। सिस्टर ट्यूटर- लेवल-9, वेतनमान 36,200 रुपए। पद नियमित और तृतीय श्रेणी सेवा के अंतर्गत आते हैं। केवल ऑनलाइन होंगे आवेदन संयुक्त परीक्षा के लिए आवेदन केवल ऑनलाइन होंगे। आधार आधारित पंजीयन अनिवार्य है। आवेदन संख्या सुरक्षित रखना जरूरी है। परीक्षा में फोटो आईडी (आधार, पैन, वोटर आईडी आदि) अनिवार्य है। रोजगार कार्यालय में जीवित पंजीयन भी जरूरी है। सामान्य वर्ग को 500 रुपए देने होंगे संयुक्त भर्ती परीक्षा के लिए सामान्य वर्ग को 500 रुपए शुल्क देना होगा। MP के SC/ST/OBC/EWS/दिव्यांग उम्मीदवारों को 250 रुपए फीस देनी होगी। बैकलॉग पद के लिए कोई शुल्क नहीं है। पोर्टल शुल्क 60 रुपए (कियोस्क) और 20 रुपए (स्वयं लॉगिन) तय है। परीक्षा का पैटर्न भर्ती परीक्षा में 100 सवाल होंगे। हर प्रश्न 1 अंक का होगा। समय 2 घंटे मिलेगा। 25 अंक के सवाल सामान्य ज्ञान, हिंदी, अंग्रेजी, गणित और विज्ञान से होंगे। नर्सिंग विषय के 75 अंक के सवाल होंगे। परीक्षा दो शिफ्ट में होगी। पहली शिफ्ट 10 से 12 बजे और दूसरी 3 से 5 बजे होगी। चयन लिखित परीक्षा की मेरिट के आधार पर होगा। सामान्य वर्ग के लिए 50% और आरक्षित वर्ग के लिए 40% न्यूनतम अंक हैं। मेरिट के बाद नियुक्ति विभाग की जरूरत और सत्यापन पर निर्भर होगी।