samacharsecretary.com

Gold-Silver Prices Crash: चांदी 13,000 रुपये सस्ती, सोने में भी भारी गिरावट, जानें 3 मुख्य कारण

इंदौर  अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप के संबोधन के बाद सोने-चांदी के भाव में भारी गिरावट आई है. ट्रंप के बयान से यह क्लियर होता हुआ दिख रहा है कि दो से तीन हफ्तों में कुछ बड़ा एक्‍शन हो सकता है. वहीं ट्रंप ने होर्मुज को लेकर कहा कि हम उस रास्‍ते से तेल लेकर नहीं आते हैं, जो देश उस रास्‍ते से तेल लेकर गुजरते हैं, वे चिंता करें और आगे आएं. अमेरिका मदद कर सकता है।  इस बयान के बाद डॉलर में काफी मजबूती देखने को मिली, जिस कारण ग्‍लोबल से लेकर MCX पर सोने-चांदी के भाव में बड़ी गिरावट आई. 5 मई वायदा के लिए चांदी का भाव करीब 13,000 रुपये टूटकर 2,29,888 रुपये प्रति किलो पर आ गया।  इसी तरह, सोने के भाव में भी भारी गिरावट रही. मल्‍टी कमोडिटी मार्केट में सोने का भाव 2200 रुपये टूटकर 1,51,161 रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गया।  इंटरनेशनल मार्केट में भी बड़ी गिरावट ग्‍लोबल मार्केट में भी सोने और चांदी की कीमतों में भारी गिरावट आई है. इंटरनेशनल मार्केट में सोने का भाव 2.15 फीसदी टूटकर 4,710.95 डॉलर प्रति औंस पर आ गए. इसकी के साथ चांदी के भाव में भी तेज गिरावट आई और यह 5.20 फीसदी गिरकर 72.108  डॉलर प्रति औंस पर आ गया।  सोने-चांदी के गिरावट के साथ ही भारतीय शेयर बाजार में भी भारी गिरावट आई है. सेंसेक्‍स में 1500 अंकों से ज्‍यादा की गिरावट आई, जबकि निफ्टी 420 अंको से ज्‍यादा टूटा है।  क्‍यों आई सोने-चांदी के भाव में इतनी बड़ी गिरावट     ट्रंप के संबोधन से बाजार का मूड बिगड़ा है. ट्रंप ने कहा है कि हम 2 से 3 हफ्तों में बड़ी कार्रवाई करेंगे. इस बयान के बाद जंग के हालात और बिगड़ते हुए दिख रहे हैं, जिस कारण सोने-चांदी के भाव में भी गिरावट देखी जा रही है।        कच्‍चे तेल के दाम में भी भारी तेजी आई है. कल की तुलना में कच्‍चे तेल का भाव 8 डॉलर प्रति बैरल से ज्‍यादा चढ़कर 106 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चला गया है।      डॉलर इंडेक्‍स में तेजी देखी जा रही है, जो अब करीब 100 के करीब पहुंच रहा है. वहीं रुपया डॉलर की तुलना में 94 लेवल के करीब है. डॉलर की मजबूती से सोने-चांदी के भाव में भारी गिरावट है।    

मध्यप्रदेश में ओले और आंधी-बारिश का दौर, 30 जिलों में बारिश और निमाड़ में ओले गिरने का अलर्ट

भोपाल  मध्यप्रदेश में मौसम ने करवट लेकर राहत और आफत दोनों का माहौल बना दिया है। प्रदेश में सक्रिय मजबूत वेदर सिस्टम के चलते आंधी, बारिश और ओलावृष्टि का सिलसिला जारी है, जो 5 अप्रैल तक थमने के आसार नहीं हैं। गुरुवार को राजधानी भोपाल, इंदौर समेत करीब 30 जिलों में बारिश का अलर्ट जारी किया गया है, जबकि निमाड़ क्षेत्र के धार, बड़वानी और झाबुआ में ओले गिरने की संभावना जताई गई है। पिछले 72 घंटों से प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में तेज हवाओं, गरज-चमक और बारिश ने मौसम को अस्थिर बनाए रखा है। बुधवार को भी आधे प्रदेश में बादल, बारिश और आंधी का असर देखने को मिला। अगले 24 घंटे के दौरान जिन जिलों में बारिश हो सकती है, उनमें ग्वालियर, भोपाल, इंदौर, उज्जैन, मुरैना, श्योपुर, शिवपुरी, गुना, अशोकनगर, नीमच, मंदसौर, रतलाम, अलीराजपुर, झाबुआ, धार, बड़वानी, आगर-मालवा, राजगढ़, विदिशा, रायसेन, नर्मदापुरम, छिंदवाड़ा, पांढुर्णा, बैतूल, हरदा, खंडवा, बुरहानपुर, खरगोन, देवास, शाजापुर शामिल हैं। 50Km/प्रतिघंटा से चलेगी आंधी मौसम विभाग के अनुसार, गुरुवार को छिंदवाड़ा, सिवनी और पांढुर्णा में तेज आंधी चलेगी। इसकी रफ्तार 40 से 50 किलोमीटर प्रतिघंटा तक रह सकती है। बाकी जिलों में 30 से 40 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से आंधी चलेगी। इससे पहले बुधवार को भोपाल में गरज-चमक के साथ बारिश हुई। सीहोर में आंधी-बारिश के साथ ओले गिरे। इंदौर, देवास, उज्जैन, खंडवा, छिंदवाड़ा, नरसिंहपुर, जबलपुर, सिवनी, मंडला, डिंडौरी, अनूपपुर, रायसेन, विदिशा, रतलाम, मंदसौर, खरगोन, बड़वानी, शहडोल, शाजापुर और बालाघाट समेत कई जिलों में मौसम बदला रहा। तेज हवाओं का भी खतरा मौसम विभाग के अनुसार छिंदवाड़ा, सिवनी और पांढुर्णा में आंधी की रफ्तार 40 से 50 किमी प्रति घंटा तक पहुंच सकती है। अन्य जिलों में 30 से 40 किमी प्रति घंटा की गति से हवाएं चलेंगी, जिससे फसलों और कमजोर ढांचों को नुकसान की आशंका है। बारिश के साथ गर्मी भी बरकरार अजीब मौसम के बीच गर्मी का असर भी बना हुआ है। नर्मदापुरम में तापमान 40 डिग्री तक पहुंच गया, जबकि रतलाम, मंडला, खजुराहो, रायसेन, दमोह और सागर में भी पारा 38-39 डिग्री के बीच रहा। बड़े शहरों में जबलपुर 38.4°C, भोपाल 37.4°C, इंदौर 36.5°C, ग्वालियर 36.1°C और उज्जैन 35.6°C दर्ज किया गया। क्यों बदल रहा मौसम? प्रदेश में साइक्लोनिक सर्कुलेशन और ट्रफ लाइन सक्रिय है, वहीं उत्तर-पश्चिमी हिस्से में भी दो सिस्टम काम कर रहे हैं। 7 अप्रैल से एक नया पश्चिमी विक्षोभ भी एक्टिव होगा, जिससे 10 अप्रैल तक मौसम ऐसा ही बना रह सकता है। अप्रैल के दूसरे हफ्ते से सिस्टम कमजोर पड़ते ही तेज गर्मी का दौर शुरू होगा। महीने के आखिरी तक ग्वालियर, धार, खरगोन और बड़वानी जैसे जिलों में तापमान 44-45 डिग्री तक पहुंच सकता है। 

हिंसा को पीछे छोड़, कांकेर में नक्सल प्रभावितों को मिल रही नई दिशा और रोजगार के अवसर

हिंसा छोड़कर नई दिशा, नई राह की ओर बढ़ रहे कदम आत्मसमर्पित व नक्सल पीड़ितों को कलेक्टर ने सौंपा नियुक्ति पत्र प्रशिक्षण उपरांत रोजगार देने वाला पहला जिला बना कांकेर रायपुर  मानव समाज का सबसे उत्कृष्ट पहलू सकारात्मक परिवर्तन है, जिससे जीवन में नवाचार और नए विचार जन्म लेते हैं। ऐसा ही बदलाव आत्मसमर्पित माओवादियों के जीवन में दिखाई दे रहा है। जिला प्रशासन की पहल पर उन्हें पहले प्रशिक्षित किया गया और अब कुशल होने के बाद रोजगार भी मुहैया हो रहा है। आत्मसमर्पित माओवादियों को भानुप्रतापपुर के ग्राम मुल्ला (चौगेल) के कैम्प में विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षण दिया गया, जिसमें पारंगत होने के बाद प्रशासन के प्रयासों से रोजगार भी दिलाया जा रहा है। मुख्यधारा में लौटकर प्रशिक्षण के उपरांत रोजगार प्रदान करने के मामले में उत्तर बस्तर कांकेर पहला जिला है। कलेक्टर निलेशकुमार महादेव क्षीरसागर और जिला पंचायत के सीईओ श्री हरेश मंडावी ने आज कलेक्टर कक्ष में आज सुबह 04 आत्मसमर्पित माओवादी व पीड़ितों को नियुक्ति पत्र सौंपा तथा उन्हें नई शुरूआत के लिए अपनी शुभकामनाएं दीं। इनमें पुनर्वासित सगनूराम आंचला एवं नक्सल पीड़ित रोशन नेताम, बीरसिंह मंडावी और संजय नेताम शामिल थे। इन सभी को निजी फर्म का नियुक्ति पत्र प्रदाय किया गया, जहां 15 हजार रूपए प्रतिमाह मानदेय और अन्य प्रकार की वित्तीय सुविधाएं प्राप्त होंगी। श्री आंचला ने बताया कि शिक्षा और सही-गलत की जानकारी के अभाव में माओवादी संगठन से जुड़ गया था। उन्हांने कहा कि मनुष्य की अहमियत मुख्यधारा में जुड़ने के बाद ही पता चली। जीवन के अलग-अलग रंगों व वास्तविक खुशियों की पहचान अब जाकर हुई। श्री आंचला ने शासन-प्रशासन का आभार मानते हुए कहा कि जीने का असली मकसद अब मिला है। इसी तरह माओवाद पीड़ित श्री बीरसिंह मंडावी ने कहा कि ग्राम मुल्ला (चौगेल) के कैम्प में पुनर्जीवन मिला है, जहां निःशुल्क प्रशिक्षण देकर उन्हें कुशल एवं पारंगत बनाया गया। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण के बाद जिला प्रशासन द्वारा रोजगार भी दिया जा रहा है। प्रदेश सरकार की पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर हिंसा का मार्ग छोड़ समाज की मुख्यधारा में लौट रहे हैं। ज्ञात हो कि प्रशिक्षण देकर उन्हें नियोजित करने के मामले में कांकेर बस्तर संभाग का पहला जिला बन गया है। यह शासन की विशिष्ट पहल है, जिसके चलते उन्हें अपनी प्रतिभा निखारने व तराशने तथा उसे नई दिशा देने की कवायद हो रही है। इस प्रकार शासन की सकारात्मक पहल का प्रत्यक्ष लाभ पुनर्वासितों व पीड़ितों को मिल रहा है।

योगी सरकार में औद्योगिक क्रांति: 9 साल में 17 हजार से अधिक कारखाने पंजीकृत

योगी सरकार में औद्योगिक क्रांति, 9 साल में 17 हजार से अधिक कारखाने पंजीकृत पिछले 70 वर्षों में प्रदेश में पंजीकृत हुए थे केवल 14 हजार कारखाने 16 लाख से अधिक लोगों को रोजगार, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से सामाजिक-आर्थिक बदलाव के संकेत लखनऊ  योगी सरकार ने पिछले नौ वर्षों में प्रदेश में औद्योगिक विकास के क्षेत्र में एक नई पहचान बनाई है। योगी सरकार के सुशासन, पारदर्शी नीतियों और दूरदर्शी नेतृत्व का ही असर है कि प्रदेश में अप्रैल 2017 से अब तक 17,841 नए कारखाने पंजीकृत किए गए हैं। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के स्वतंत्र होने के बाद वर्ष 1947 से मार्च 2017 तक लगभग 70 वर्षों में प्रदेश में कुल 14,178 कारखाने ही पंजीकृत हो पाए थे। वर्तमान समय में प्रदेश में कुल पंजीकृत कारखानों की संख्या 32,019 तक पहुंच चुकी है। ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ से प्रदेश में बना निवेश अनुकूल माहौल प्रमुख सचिव श्रम एवं रोजगार डॉ. एमके शनमुगा सुंदरम ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का विजन प्रदेश को देश की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला राज्य बनाना है। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए योगी सरकार ने ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ से सुधार, निवेश अनुकूल माहौल और पारदर्शी प्रक्रियाओं पर विशेष ध्यान दिया। साथ ही निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सिंगल विंडो सिस्टम, ऑनलाइन क्लीयरेंस, भूमि बैंक, बेहतर कानून-व्यवस्था और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी सुविधाएं विकसित कीं। यही वजह है कि देश-विदेश के निवेशकों का भरोसा उत्तर प्रदेश पर बढ़ा है। उन्होंने बताया कि प्रदेश में 17,841 कारखाने अप्रैल 2017 के बाद पंजीकृत हुए हैं, जो राज्य में औद्योगिक गतिविधियों की तेज रफ्तार को दर्शाते हैं। सिर्फ सितंबर 2023 से अब तक ही 10,194 कारखानों का पंजीकरण हुआ है, जबकि चालू वित्तीय वर्ष में 4,746 नए कारखाने जुड़े हैं। अप्रैल 2017 के बाद पंजीकृत इन कारखानों में वर्तमान में 16,53,179 लोग नौकरी कर रहे हैं। इनमें 15,29,907 पुरुष व 1,23,272 महिलाएं कार्यरत हैं। सबसे अधिक 10,895 कारखाने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पंजीकृत प्रमुख सचिव ने बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 10,895, मध्य उत्तर प्रदेश में 3,526, पूर्वी उत्तर प्रदेश में 3,205 और बुंदेलखंड क्षेत्र में 215 कारखाने पंजीकृत किए गए हैं। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि योगी सरकार ने क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करते हुए हर क्षेत्र में उद्योगों को बढ़ावा दिया, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा हुए। इन कारखानों से प्रदेश में औद्योगिक विकास के साथ-साथ रोजगार सृजन भी तेजी से हुआ है। खास बात यह है कि कारखानों में कार्यरत महिलाओं की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है, जो प्रदेश में सामाजिक-आर्थिक बदलाव का संकेत है। कानून-व्यवस्था और इंफ्रास्ट्रक्चर का बड़ा योगदान प्रदेश में 14,412 कारखाने ऐसे हैं, जिनमें 100 तक श्रमिक कार्यरत हैं जबकि 3,213 कारखानों में 101 से 1000 श्रमिक कार्यरत हैं। इसी तरह 118 बड़े कारखाने ऐसे हैं जिनमें 1000 से अधिक श्रमिक कार्यरत हैं। यह संख्या दर्शाती है कि योगी सरकार ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों (एमएसएमई)के साथ-साथ बड़े उद्योगों को भी समान रूप से प्रोत्साहन दिया है। इससे प्रदेश की औद्योगिक संरचना मजबूत हुई है। बता दें कि औद्योगिक विकास में कानून-व्यवस्था की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। योगी सरकार ने इस क्षेत्र में सख्त कदम उठाते हुए प्रदेश में सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित किया, जिससे निवेशकों का विश्वास बढ़ा। इसके साथ ही एक्सप्रेसवे, डिफेंस कॉरिडोर, एयरपोर्ट और लॉजिस्टिक हब जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स ने उद्योगों को नई गति दी। इन प्रयासों का परिणाम यह है कि उत्तर प्रदेश अब सिर्फ कृषि प्रधान राज्य नहीं रहा, बल्कि तेजी से औद्योगिक राज्य के रूप में उभर रहा है। नए कारखानों ने न केवल रोजगार दिया, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत किया है। इससे प्रदेश के लाखों परिवारों की आजीविका सुरक्षित हुई है।

तमिलनाडु ओपिनियन पोल: इंडिया ब्लॉक के किले पर संकट, BJP गठबंधन को मिल रही मजबूत बढ़त

चेन्नई  तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से ही रोमांचक और अनिश्चित रही है. 23 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले वोटवाइब के वोट ट्रैकर ओपिनियन पोल ने एक बार फिर साबित कर दिया कि राज्य में सत्ता की लड़ाई बेहद करीबी होने वाली है. सहयोगी चैनल सीएनएन-न्यूज18 पर विशेष रूप से जारी इस सर्वे के अनुसार एआईएडीएमके-बीजेपी गठबंधन यानी एनडीए को 115-125 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि सत्तारूढ़ डीएमे-कांग्रेस गठबंधन (कांग्रेस, भाकपा और माकपा सहित) यानी इंडिया गठबंधन को 104-114 सीटें मिलने का पूर्वानुमान है. ऐसे में देखा जाए तो तमिलनाडु इंडिया गठबंधन का एक तरह से अंतिम किला है. यह भी इस बार ढह जाने की संभावना है।  कुल 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 118 है. ऐसे में साफ दिख रहा है कि राज्य में कांटे की टक्कर है. इससे पहले के वोट ट्रैकर पोल में डीएमके गठबंधन को 113-123 सीटों पर बढ़त दिखाई गई थी, जबकि एआईएडीएमके गठबंधन को 106-116 सीटें मिलने की उम्मीद है. लेटेस्ट पोल में थोड़ी सी शिफ्ट एआईएडीएमके की तरफ हुई है, जो दर्शाता है कि अंतिम दिनों में वोटर मूड में बदलाव संभव है. अभिनेता विजय की नई पार्टी टीवीके युवा और शहरी वोटरों पर दांव लगा रही है और इसे 2-8 सीटें मिलने का अनुमान है. हालांकि टीवीके का प्रभाव सीमित रहने की संभावना है, लेकिन यह वोट कटौती का खेल जरूर बदल सकती है।  मुख्यमंत्री की पसंद- स्टालिन बनाम ईपीएस ओपिनियन पोल में मुख्यमंत्री की पसंद के सवाल पर एमके स्टालिन 39.8 फीसदी के साथ थोड़ी बढ़त बनाए हुए हैं, जबकि ई के पलानिस्वामी 38.8 फीसदी लोग अपनी पंसद बताते हैं. विजय को 13.6 फीसदी लोगों का समर्थन मिलता दिख रहा है. लिंग और जाति का फैक्टर यहां साफ नजर आता है. महिलाएं और एससी/दलित वोटर स्टालिन के पक्ष में ज्यादा झुके हुए हैं, जबकि पुरुष और अपर कास्ट हिंदू ईपीएस को अधिक पसंद करते दिख रहे हैं. युवा वोटरों में विजय के प्रति आकर्षण दिख रहा है. ये आंकड़े बताते हैं कि तमिलनाडु की राजनीति अभी भी जाति, लिंग और उम्र के आधार पर बंटी हुई है।  डीएमके सरकार की परफॉर्मेंस पर राय बंटी हुई है. सिर्फ 35.5 फीसदी लोगों ने इसे अच्छा या बहुत अच्छा बताया, जबकि 40.8 फीसदी ने खराब या बहुत खराब कहा. महिलाओं और बुजुर्ग वोटरों में संतोष ज्यादा है, वहीं युवा और अपर कास्ट हिंदू ज्यादा आलोचनात्मक हैं।  मुख्य मुद्दे क्या हैं? सर्वे में वोटरों ने जो मुद्दे सबसे ज्यादा उठाए उनमें कानून-व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा (23.1 फीसदी), शराब और नशीले पदार्थ (20.8 फीसदी) और बेरोजगारी (17.3 फीसदी) प्रमुख हैं. भ्रष्टाचार, महंगाई और विकास संबंधी चिंताएं भी शामिल हैं. एससी/दलित वोटर बेरोजगारी को प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि अपर कास्ट वोटर कानून-व्यवस्था पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं. ये मुद्दे चुनावी रणनीति तय करने में दोनों गठबंधनों के लिए अहम होंगे।  फ्रीबीज का असर सीमित तमिलनाडु में फ्रीबीज (मुफ्त योजनाएं) की राजनीति लंबे समय से चर्चा में रही है, लेकिन इस पोल में इसका प्रभाव काफी सीमित नजर आया. 44.2 फीसदी वोटरों ने कहा कि फ्रीबीज उनका वोट तय नहीं करते, जबकि 28.9 फीसदी ने फ्रीबीज देने वाली पार्टियों के खिलाफ वोट करने की बात कही. सिर्फ 8.6 फीसदी ही फ्रीबीज से सकारात्मक रूप से प्रभावित हैं. अपर कास्ट हिंदू (31.8 फीसदी) और OBC (30.6 फीसदी) फ्रीबीज के खिलाफ सबसे ज्यादा हैं, जबकि एससी/दलित वोटरों में वेलफेयर स्कीम्स अभी भी कुछ असर रखती हैं. यह इंगित करता है कि अब वोटर परफॉर्मेंस, मुद्दों और नेतृत्व पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।  ईरान युद्ध और ऊर्जा सुरक्षा पर सकारात्मक नजरिया पोल में एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर भी सवाल पूछा गया. यह सवाल ईरान-अमेरिका संघर्ष के दौरान भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर था. 40.9 फीसदी वोटरों ने भारत के प्रदर्शन को बहुत अच्छा बताया, 15.3 फीसदी ने अच्छा, 20.6 फीसदी ने औसत और 17.8 फीसदी ने खराब राय दी. यह दर्शाता है कि राष्ट्रीय मुद्दों पर भी तमिलनाडु के वोटर सकारात्मक सोच रखते हैं, हालांकि 5.5 फीसदी कुछ नहीं कह सकते रहे, जो जागरूकता की कमी या उदासीनता दर्शाता है।  नई सरकार या हंग असेंबली? वर्तमान पोल के अनुसार एआईएडीएमके-बीजेपी गठबंधन 115-125 सीटों के साथ बहुमत (118) के काफी करीब है, लेकिन अभी भी अनिश्चितता बाकी है. डीएमके गठबंधन 104-114 सीटों पर सिमट सकता है, लेकिन छोटे बदलाव से नतीजे पलट सकते हैं. टीवीके अगर 4-5 सीटें भी जीत ले या वोट काटे तो गठबंधनों का गणित बिगड़ सकता है. पिछले पोल से तुलना करें तो पहले डीएमके को मामूली बढ़त दिख रही थी, अब एआईएडीएमके ने थोड़ी बढ़त हासिल कर ली है. यह दर्शाता है कि अंतिम चरण में कैंपेन, स्थानीय मुद्दे और गठबंधन की मजबूती फैसला करेंगे. तमिलनाडु की राजनीति में ड्रामे की कमी नहीं रहती – पिछले चुनावों में भी अंतिम समय में कई सरप्राइज देखे गए हैं।  ऐसे में यह ओपिनियन पोल साफ संकेत देता है कि तमिलनाडु एक और कड़ी टक्कर देखने को तैयार है. एआईएडीएमके-बीजेपी को मामूली बढ़त है, लेकिन डीएमके की सत्ता में वापसी की संभावना पूरी तरह से खारिज नहीं की जा सकती. विजय की टीवीके युवा वोटरों को आकर्षित कर कुछ हलचल जरूर पैदा कर सकती है। 

सर्वे 2025 में दावा: देश में बेरोजगारी घट रही है, 61.3 करोड़ लोग काम पर; महिलाओं का वेतन वृद्धि पुरुषों से ज्यादा

नई दिल्ली देश में बेरोजगारी दर 2025 में थोड़ी घटकर 3.1% हो गई है। यह आंकड़ा 2024 में 3.2% था, यानी मामूली सुधार जरूर हुआ है। यह जानकारी सरकार के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) 2025 में सामने आई है, जिसे सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने जारी किया है। रिपोर्ट बताती है कि रोजगार के मामले में देश में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है और यह सुधार लगभग हर सेक्टर और पुरुष-महिला दोनों में देखने को मिला है। पुरुषों की बेरोजगारी दर 3.3% से घटकर 3.1% हो गई, जबकि महिलाओं की बेरोजगारी दर 3.1% पर ही स्थिर रही।  गांवों में स्थिति ज्यादा बेहतर अगर ग्रामीण और शहरी इलाकों की बात करें तो गांवों में स्थिति ज्यादा बेहतर दिख रही है। ग्रामीण बेरोजगारी दर 2.5% से घटकर 2.4% हो गई, जो यह दिखाता है कि गांवों में लोगों को काम मिलने की स्थिति मजबूत हो रही है। खास बात यह है कि गांवों में महिलाओं की बेरोजगारी दर सिर्फ 2.1% रही, जो पुरुषों (2.6%) से भी कम है। वहीं शहरों में बेरोजगारी दर ज्यादा है, पुरुषों के लिए 4.2% और महिलाओं के लिए 6.4%। लैंगिक और क्षेत्रीय विश्लेषण सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, पुरुषों की बेरोजगारी दर में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है, जो 2024 के 3.3% से घटकर 2025 में 3.1% पर आ गई है. वहीं, महिलाओं के लिए बेरोजगारी दर 3.1% पर स्थिर बनी हुई है।  ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच श्रम अवशोषण की क्षमता में भी अंतर देखा गया. ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 2.4% दर्ज की गई, जो पिछले वर्ष के 2.5% से कम है. विशेष रूप से, ग्रामीण भारत में महिलाओं की बेरोजगारी दर केवल 2.1% रही, जो इसी क्षेत्र के पुरुषों (2.6%) की तुलना में बेहतर स्थिति दर्शाती है. शहरी क्षेत्रों में, पुरुषों के लिए यह दर 4.2% और महिलाओं के लिए 6.4% रही।  रोजगार की प्रकृति में बदलाव: स्वरोजगार से वेतनभोगी नौकरियों की ओर रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू रोजगार की गुणवत्ता में आया सुधार है. आंकड़ों से पता चलता है कि देश में स्वरोजगार की हिस्सेदारी 57.5% से घटकर 56.2% रह गई है. इसके विपरीत, 'नियमित वेतनभोगी नौकरियों' में वृद्धि देखी गई है, जो 22.4% से बढ़कर 23.6% हो गई है. यह वृद्धि पुरुषों (25.4% से 26.5%) और महिलाओं (16.6% से 18.2%) दोनों के लिए समान रूप से दर्ज की गई, जो अर्थव्यवस्था के औपचारिकरण का संकेत है।  क्षेत्रीय बदलाव और आय में वृद्धि औद्योगिक भागीदारी के मामले में, कृषि क्षेत्र अभी भी सबसे बड़ा नियोक्ता बना हुआ है, हालांकि इसकी हिस्सेदारी 44.8% से घटकर 43.0% रह गई है. निर्माण क्षेत्र में भी 12.3% से गिरकर 12% की मामूली गिरावट आई है. दूसरी ओर, विनिर्माण क्षेत्र में सुधार हुआ है, जो 11.6% से बढ़कर 12.1% हो गया है, और सेवा क्षेत्र भी 12.2% से बढ़कर 13.1% पर पहुँच गया है।  श्रमिकों की औसत आय में भी सम्मानजनक वृद्धि देखी गई है. नियमित वेतन पाने वाले पुरुषों की औसत मासिक आय 5.8% की वृद्धि के साथ ₹24,217 हो गई है, जबकि महिलाओं की आय में 7.2% की शानदार वृद्धि दर्ज की गई है, जो अब ₹18,353 है. स्वरोजगार श्रेणी में भी पुरुषों की आय में 6% और महिलाओं की आय में 8.8% का इजाफा हुआ है।  सर्वेक्षण का पैमाना यह व्यापक सर्वेक्षण देश भर के 2,70,472 घरों (1,48,718 ग्रामीण और 1,21,754 शहरी) में किया गया था, जिसमें कुल 11,48,634 व्यक्तियों के डेटा का विश्लेषण किया गया. रिपोर्ट यह निष्कर्ष निकालती है कि श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) ग्रामीण क्षेत्रों में 80.5% (पुरुष) और 45.9% (महिला) के साथ मजबूत बनी हुई है, जो भारत की आर्थिक विकास यात्रा में श्रम शक्ति की सक्रिय भूमिका की पुष्टि करती है।  खेती अभी भी सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र रोजगार के प्रकार में भी बदलाव देखने को मिला है। खुद का काम करने वालों की हिस्सेदारी थोड़ी घटी है, 2024 में 57.5% से घटकर 2025 में 56.2% रह गई। लेकिन अच्छी बात यह है कि नियमित सैलरी वाली नौकरियों में बढ़ोतरी हुई है, जो 22.4% से बढ़कर 23.6% हो गई। इसका मतलब है कि लोगों को ज्यादा स्थायी नौकरियां मिल रही हैं। वहीं दिहाड़ी मजदूरी लगभग 20% के आसपास ही बनी हुई है। सेक्टर के हिसाब से देखें तो खेती अभी भी सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र है, लेकिन इसमें थोड़ी गिरावट आई है, 44.8% से घटकर 43%। इसके अलावा मैन्युफैक्चरिंग (कारखानों) में रोजगार बढ़ा है और सर्विस सेक्टर (जैसे होटल, ट्रांसपोर्ट, अन्य सेवाएं) में भी अच्छी बढ़ोतरी हुई है। कंस्ट्रक्शन सेक्टर में हल्की गिरावट देखी गई। पुरुषों और महिलाओं की कमाई भी बढ़ी कमाई के मामले में भी सुधार दिखा है। सैलरी वाले काम में पुरुषों की औसत कमाई करीब 5.8% बढ़कर ₹24,217 हो गई, जबकि महिलाओं की कमाई 7.2% बढ़कर ₹18,353 हो गई। खुद का काम करने वालों और महिलाओं की आमदनी में भी अच्छा इजाफा हुआ है। हालांकि दिहाड़ी मजदूरों में पुरुषों की कमाई लगभग स्थिर रही, जबकि महिलाओं की कमाई थोड़ी बढ़ी। शिक्षा और काम में भागीदारी की बात करें तो शहरों में लोगों की पढ़ाई का स्तर ज्यादा है, जबकि गांवों में थोड़ा कम है। गांवों में पुरुषों की काम में भागीदारी 80.5% और महिलाओं की 45.9% रही, जो पिछले साल के बराबर है। 

GST कलेक्शन में रिकॉर्ड उछाल! सरकार के खजाने से मिलने वाली सुविधाएं जानें

नई दिल्ली  जीएसटी कलेक्शन के मोर्चे पर अच्छी खबर है। मार्च 2026 में देश की GST कलेक्शन को लेकर अच्छी खबर सामने आई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, नेट GST कलेक्शन बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है, जो पिछले महीने के मुकाबले 8.2% ज्यादा है। इससे साफ है कि देश में कारोबार और खपत दोनों में मजबूती बनी हुई है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि टैक्स कलेक्शन में यह बढ़ोतरी आर्थिक गतिविधियों के लगातार सुधरने का संकेत देती है। वहीं, अगर ग्रॉस GST कलेक्शन की बात करें तो मार्च में यह 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले 8.8% ज्यादा है। लगातार बढ़ती GST वसूली सरकार के राजस्व को मजबूत कर रही है और आने वाले समय में विकास योजनाओं को रफ्तार देने में मदद मिलेगी। कुल मिलाकर, यह आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत माने जा रहे हैं।  इस पैसे से आपको मिलती हैं ये सुविधाएं पिछले कुछ महीनों से भारत सरकार के खजाने में गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) की रिकॉर्ड तोड़ बारिश हो रही है. देश में जीएसटी कलेक्शन लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है. हर महीने सरकार के खजाने में लाखों करोड़ रुपये जमा हो रहे हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी जेब से निकला यह टैक्स, घूम-फिरकर आपके जीवन को ‘वर्ल्ड क्लास’ बनाने में कैसे इस्तेमाल होता है? आइए समझते हैं कि सरकार इस भारी-भरकम पैसे से आम जनता के लिए कौन सी सुविधाएं तैयार कर रही है. 1. हाई-वे और एक्सप्रेसवे का बिछेगा जाल GST से होने वाली कमाई का एक बड़ा हिस्सा इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च किया जाता है. सरकार का लक्ष्य भारत के सड़क नेटवर्क को अमेरिका और यूरोप के स्तर पर ले जाना है. दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे जैसे प्रोजेक्ट्स इसी कमाई के दम पर पूरे हो रहे हैं. जब सड़कें अच्छी होती हैं, तो सामान की आवाजाही सस्ती होती है, जिससे महंगाई कम करने में मदद मिलती है. 2. हेल्थकेयर: अब हर जिले में होंगे ‘सुपर स्पेशलिटी’ अस्पताल टैक्स के जरिए सरकार देश के हेल्थ बजट को बढ़ा रही है. इसका सीधा फायदा आम आदमी को मिलता है. देश के अलग-अलग राज्यों में नए एम्स और मेडिकल कॉलेज खोले जा रहे हैं. आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के जरिए गरीबों को 5 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज मिलता है, जिसका फंड इसी टैक्स कलेक्शन से आता है. 3. रेल सफर बनेगा ‘हवाई’ सफर जैसा वंदे भारत ट्रेनों की सफलता और रेलवे स्टेशनों का कायाकल्प (जैसे अमृत भारत स्टेशन योजना) GST कलेक्शन की मजबूती का ही परिणाम है. ट्रेनों में ‘कवच’ जैसी सुरक्षा तकनीक और हाई-स्पीड ट्रैक बिछाने के लिए सरकार भारी निवेश कर रही है. रेलवे स्टेशनों पर अब आपको एयरपोर्ट जैसी लिफ्ट, एस्केलेटर और वेटिंग लाउंज देखने को मिल रहे हैं. 4. शिक्षा और डिजिटल इंडिया देश के गांवों तक हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंचाना हो या सरकारी स्कूलों को ‘स्मार्ट स्कूल’ में बदलना, जीएसटी का पैसा भविष्य की पीढ़ी को तैयार कर रहा है. डिजिटल ट्रांजेक्शन के बढ़ने से पारदर्शिता आई है, जिससे भ्रष्टाचार कम हुआ है और योजनाओं का फायदा डीबीटी के जरिए सीधे जनता के बैंक खातों में पहुंच रहा है. 0.22 लाख करोड़ रुपये के रिफंड जारी किए गए रिफंड्स की बात करें तो मार्च महीने में कुल 0.22 लाख करोड़ रुपये के रिफंड जारी किए गए, जो साल-दर-साल आधार पर 13.8% ज्यादा है। रिफंड बढ़ने के बावजूद सरकार की नेट कमाई मजबूत बनी हुई है, जो 1.78 लाख करोड़ रुपये रही। इससे यह भी संकेत मिलता है कि एक्सपोर्ट और कारोबार से जुड़े सेक्टर्स में गतिविधि तेज हुई है। ग्रॉस रेवेन्यू 1.46 लाख करोड़ रुपये रहा रेवेन्यू के अलग-अलग हिस्सों पर नजर डालें तो घरेलू लेनदेन से मिलने वाला ग्रॉस रेवेन्यू 1.46 लाख करोड़ रुपये रहा, जिसमें 5.9% की बढ़त हुई। वहीं, इंपोर्ट से मिलने वाला रेवेन्यू 0.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जिसमें 17.8% की तेज बढ़ोतरी देखने को मिली। इसका मतलब है कि देश में आयात गतिविधियां भी काफी मजबूत रही हैं। पूरे वित्त वर्ष 2025-26 की बात करें तो ग्रॉस GST कलेक्शन 8.3% बढ़कर 22.27 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया। वहीं नेट GST रेवेन्यू 7.1% की बढ़त के साथ 19.34 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। राज्यों में महाराष्ट्र ने सबसे ज्यादा योगदान दिया, जहां से करीब 0.13 लाख करोड़ रुपये का टैक्स कलेक्शन हुआ। इसके बाद कर्नाटक और गुजरात का स्थान रहा। कैसे रहे राज्यों के प्रदर्शन राज्यों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो कई राज्यों में GST कलेक्शन में अच्छी ग्रोथ देखने को मिली। इनमें हिमाचल प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश शामिल हैं। वहीं कुछ राज्यों में गिरावट भी दर्ज की गई, जैसे जम्मू-कश्मीर, चंडीगढ़, दिल्ली, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, असम, पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश। कुल मिलाकर, आंकड़े बताते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था स्थिर और मजबूत दिशा में आगे बढ़ रही है।  

मध्यप्रदेश में 2 हजार से ज्यादा सैंपल फेल, 60% डेयरी प्रोडक्ट मिलावटी

भोपाल  मध्य प्रदेश में दूध, मावा, पनीर, घी, मिर्च, धनिया पाउडर समेत कई चीजों में मिलावट हो रही है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन की जांच में यह खुलासा हुआ है। बताया जा रहा है कि करीब 2000 से ज्यादा फूड सैंपल फेल पाए गए है। करीब 30 जिलों में दो हजार सैंपल फेल हुए। इनमें ग्वालियर नंबर वन पर है। आइए जानते है कहां कौन से सैंपल फेल हुए है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन की जांच में बड़ा खुलासा हुआ है। मोबाइल वैन के जरिए लिए गए सैंपल की तीन साल की रिपोर्ट सामने आई है। मोबाइल वैन के संचालन से लेकर अब तक करीब एक लाख सैंपल लेने का दावा किया गया है। जिसमें रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले दूध, मावा, पनीर और घी जैसे डेयरी प्रोडक्ट ही सबसे ज्यादा मिलावटी पाए गए है। मिठाइयों के साथ मसाले और तेल भी सुरक्षित नहीं है। जलेबी, लड्डू, बर्फी गजक और नमकीन में मिलावट मिली। लाल मिर्च, धनिया पाउडर, हल्दी और सोयाबीन तेल के कई सैंपल फेल हो गए। फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) की हाल में एक रिपोर्ट सामने आई। जिसमें 2000 से ज्यादा फूड सैंपल फेल पाए गए। सबसे ज्यादा मामले करीब 420 ग्वालियर से सामने आए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले दूध, मावा, पनीर और घी जैसे डेयरी प्रोडक्ट ही सबसे ज्यादा मिलावटी पाए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मिलावट केवल फूड पॉइजनिंग ही नहीं, बल्कि डायबिटीज, हार्ट डिजीज और हार्मोनल बीमारियों तक का कारण बन रही है। FDA की यह रिपोर्ट मोबाइल वैन के जरिए लिए गए सैंपल और उनकी टेस्ट रिजल्ट के आधार पर तैयार की गई है। जिसमें बीते तीन साल के आंकड़े शामिल हैं। यह पहली बार है जब मोबाइल वैन के संचालन से लेकर अब कर लिए गए एक लाख सैंपल की कंपाइल रिपोर्ट सामने आई है। ग्वालियर सबसे आगे, कई जिलों में फैला मिलावट का जाल राज्य के खाद्य सुरक्षा विभाग की रिपोर्ट के अनुसार ग्वालियर जिले में सबसे ज्यादा मिलावट के मामले सामने आए हैं, जहां करीब 420 सैंपल फेल पाए गए। इसके बाद गुना (110), उज्जैन (95), भिंड (90) और बुरहानपुर (75) जैसे जिलों में भी बड़ी संख्या में नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे। इसके अलावा शाजापुर, इंदौर, धार, रीवा, सागर, सीहोर और नरसिंहपुर सहित 30 से अधिक जिलों में मिलावट का जाल फैला हुआ है। जांच में दूध, पनीर, मावा, मिठाइयों और मसालों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी सामने आई है। मिलावट से शरीर को कैसे हो रहा नुकसान गांधी मेडिकल कॉलेज के एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. मनुज शर्मा बताते हैं कि मिलावटी भोजन में मौजूद एंडोक्राइन डिसरप्टिंग केमिकल्स (जैसे माइक्रोप्लास्टिक, हेवी मेटल) शरीर में जाकर हार्मोन सिस्टम को प्रभावित करते हैं। इससे गट हेल्थ खराब होती है। बॉडी में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया नष्ट होते हैं। शरीर में पोषण की कमी होती है। इसके साथ ही मोटापा, डायबिटीज और पीसीओडी जैसी बीमारियां बढ़ती हैं। मसाले और तेल भी नहीं सुरक्षित सिर्फ डेयरी ही नहीं, मसाले और खाद्य तेल भी मिलावट से अछूते नहीं हैं। लाल मिर्च, धनिया पाउडर, हल्दी और सोयाबीन तेल के कई सैंपल फेल पाए गए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इनका लगातार सेवन लिवर और किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है और लंबे समय में कैंसर का खतरा भी बढ़ा सकता है। जलेबी, लड्डू, बर्फी, गजक और नमकीन जैसे खाद्य पदार्थों में भी बड़े पैमाने पर मिलावट सामने आई है। त्योहारों के दौरान यह खतरा और बढ़ जाता है। दमोह, भिंड और मुरैना जैसे जिलों में मिठाइयों के सैंपल बड़ी संख्या में फेल पाए गए हैं। लगातार चल रही मॉनिटरिंग FDA आयुक्त दिनेश श्रीवास्तव ने कहा कि फेल सैंपलों के आधार पर संबंधित दुकानदारों और निर्माताओं के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। जुर्माना और कानूनी कार्रवाई की लगातार की जा रही है। निगरानी सख्त की गई है। मिलावट का यह नेटवर्क खत्म करने के लिए नई योजना के तहत प्रदेश में काम किया जा रहा है। मोबाइल वैन प्रदेशभर में घूमकर सैंपल एकत्र कर उनकी टेस्टिंग कर रही हैं। मिलावट में ग्वालियर नंबर वन     ग्वालियर जिला मिलावट में पहले स्थान पर है। यहां दो हजार में से लगभग 420 सैंपल फेल हुए है।     गुना – 110     उज्जैन – 95     भिंड – 90,     बुरहानपुर – 75,     जबलपुर – 75     शाजापुर – 70     खरगोन – 65     सीहोर – 55     धार – 40     राजगढ़ – 35     नीमच – 30     नरसिंहपुर – 28     रीवा – 25     दमोह – 20     हरदा – 20     अलीराजपुर – 20     विदिशा – 18     झाबुआ – 18     सागर – 15     मंडला – 15     दतिया – 15     शिवपुरी – 12     छिंदवाड़ा – 12     बालाघाट – 10     डिंडोरी – 08     पन्ना – 08     कटनी – 06     शहडोल – 06 कहां कौन से सैंपल फेल     ग्वालियर- दूध, दही, पनीर, घी, मिक्स्ड मिल्क, गजक, मावा बर्फी, मालाई बर्फी, चावल, आटा     इंदौर- लस्सी, मिल्क केक, मावा कतली, पनीर, इडली, सांभर     शाजापुर- दूध, घी, पनीर, मावा, बेसन, लाल मिर्च पाउडर, कुकिंग ऑयल     दमोह- जलेबी, बेसन लड्डू, आलू मटर, चाउमीन, घी, पनीर, दही     भिंड- मालाई बर्फी, मावा पेड़ा, सौंफ और काली मिर्च     मुरैना- मावा, घी, पनीर, बेसन लड्डू, बूंदी लड्डू     धार- मावा, पनीर, धनिया पाउडर, पताशे     सागर- मोतीचूर लड्डू में मिलावट     रीवा- तुअर दाल और मिठाई     सिवनी- गुजिया, सेव और पनीर     नरसिंहपुर- दूध में मिलावट     खंडवा- गुड़ चिक्की का सैंपल फेल     बैतूल- दही और काली मिर्च में मिलावट     सीहोर- खाने का तेल  

तेल-गैस की तलाश में मेगा गेम शुरू, कीमतों में गिरावट और निवेश का मौका

नई दिल्ली  भारत सरकार ने तेल और प्राकृतिक गैस की खोज को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ा फैसला लेते हुए देश के 2.62 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को एक्सप्लोरेशन के लिए खोल दिया है. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है और भारत अपनी जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है. सरकार का मकसद साफ है कि आने वाले वर्षों में देश को ऊर्जा के मामले में ज्यादा आत्मनिर्भर बनाया जाए और घरेलू उत्पादन को बढ़ाया जाए।  क्या है पूरा फैसला और कितना बड़ा है इसका दायरा: सरकार ने कुल 2,62,817 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को एक्सप्लोरेशन के लिए खोला है, जिसमें जमीन के साथ साथ समुद्री क्षेत्र भी शामिल हैं. यह कोई छोटा कदम नहीं है, बल्कि भारत के कुल सेडिमेंटरी बेसिन का बड़ा हिस्सा अब कंपनियों के लिए उपलब्ध हो गया है. इसका मतलब है कि अब पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा इलाकों में तेल और गैस की तलाश की जा सकेगी।  OALP मॉडल क्या है और कंपनियों को कैसे फायदा मिलेगा: यह पूरा प्रोसेस ओपन एकरेज लाइसेंसिंग प्रोग्राम यानी OALP के तहत किया जा रहा है. इस मॉडल की खास बात यह है कि इसमें सरकार खुद ब्लॉक ऑफर करने के बजाय कंपनियों को यह आजादी देती है कि वे अपनी पसंद के इलाकों को पहचान कर वहां के लिए बोली लगा सकें. इससे कंपनियों की दिलचस्पी बढ़ती है और एक्सप्लोरेशन ज्यादा टारगेटेड तरीके से हो पाता है।  किन इलाकों में होगा एक्सप्लोरेशन और क्या है संभावना: इस फैसले के तहत 26 सेडिमेंटरी बेसिन के ब्लॉक्स को शामिल किया गया है. ये वही इलाके होते हैं जहां भूगर्भीय संरचना ऐसी होती है कि तेल और गैस मिलने की संभावना ज्यादा रहती है. हालांकि संभावना होना और असल में रिजर्व मिलना दो अलग बातें हैं, इसलिए हर ब्लॉक में सफलता की गारंटी नहीं होती। समुद्र पर बढ़ता फोकस और समुद्र मंथन पहल: सरकार इस बार खासतौर पर डीप सी एक्सप्लोरेशन पर जोर दे रही है, जो प्रधानमंत्री के समुद्र मंथन इनिशिएटिव का हिस्सा है. बंगाल की खाड़ी और अरब सागर जैसे इलाकों में बड़ी संभावनाएं मानी जाती हैं, लेकिन यहां काम करना तकनीकी रूप से ज्यादा चुनौतीपूर्ण और महंगा होता है।  विदेशी और निजी कंपनियों के लिए बड़ा मौका: इस कदम के जरिए सरकार ने साफ तौर पर ग्लोबल ऑयल और गैस कंपनियों को भारत में निवेश के लिए न्योता दिया है. रिलायंस, ओएनजीसी के अलावा बीपी, शेल, टोटल और एक्सॉन जैसी विदेशी कंपनियां भी इसमें दिलचस्पी दिखा सकती हैं. इससे न सिर्फ निवेश आएगा बल्कि नई तकनीक और विशेषज्ञता भी देश में आएगी।  भारत की आयात निर्भरता कम करने की कोशिश: भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जो अर्थव्यवस्था पर बड़ा बोझ डालता है. अगर घरेलू स्तर पर उत्पादन बढ़ता है, तो इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और वैश्विक कीमतों में उतार चढ़ाव का असर भी कम होगा. यही इस फैसले के पीछे की सबसे बड़ी रणनीतिक सोच है।  चुनौतियां भी कम नहीं हैं, समय और लागत दोनों भारी: तेल और गैस की खोज कोई आसान या जल्दी होने वाली प्रक्रिया नहीं है. इसमें कई साल लग जाते हैं और भारी निवेश करना पड़ता है. कई बार कंपनियों को सालों की मेहनत के बाद भी कुछ नहीं मिलता, इसलिए जोखिम भी काफी ज्यादा होता है।  कब दिखेगा असर और क्या है आगे की तस्वीर: इस फैसले का असर तुरंत नहीं दिखेगा क्योंकि एक्सप्लोरेशन से लेकर प्रोडक्शन तक पहुंचने में 5 से 10 साल तक का समय लग सकता है. लेकिन अगर कुछ बड़े रिजर्व मिलते हैं, तो आने वाले समय में भारत की ऊर्जा स्थिति मजबूत हो सकती है और देश को आयात पर कम निर्भर रहना पड़ेगा।   

बांगलादेश से मालदीव तक, इन देशों ने भारत के खिलाफ मोर्चा खोला, अब मदद की गुहार

नई दिल्ली ईरान युद्ध से उपजे वैश्विक तेल और गैस संकट के बीच मालदीव और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश भारत से मदद मांग रहे हैं। जानें कैसे नई दिल्ली पुरानी बगावत को भुलाकर 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति के तहत अपना पड़ोसी धर्म निभा रहा है। 28 फरवरी को ईरान में शुरू हुए अमेरिका-इजरायल युद्ध ने पूरी दुनिया के सामने एक अभूतपूर्व ऊर्जा संकट खड़ा कर दिया है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव के कारण ग्लोबल सप्लाई चेन टूट चुकी है और कच्चे तेल व गैस की कीमतों में लगी आग से वैश्विक अर्थव्यवस्था झुलस रही है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से विश्व का करीब 20% तेल और गैस गुजरता है। यह लगभग पूरी तरह बंद है जिसके कारण दक्षिण एशिया के देशों में पेट्रोल-डीजल, एलपीजी और बिजली संकट गहरा गया है। इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है। जिन पड़ोसी देशों- विशेषकर मालदीव और बांग्लादेश ने हाल के वर्षों में अपनी घरेलू राजनीति चमकाने के लिए भारत के खिलाफ मुखर बगावत की थी और 'इंडिया आउट' जैसे अभियान चलाए थे वे आज गहरे तेल और गैस संकट से जूझते हुए उसी भारत से मदद की गुहार लगा रहे हैं। दूसरी ओर, भारत ने अपनी 'नेबरहुड फर्स्ट' (पड़ोसी प्रथम) नीति और कूटनीतिक बड़प्पन का परिचय देते हुए तमाम कड़वाहटों को दरकिनार कर इन देशों की ओर मदद का हाथ बढ़ाया है। हाल ही में बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव ने भारत से ईंधन सप्लाई करने की मांग की थी। विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार, इन पड़ोसी देशों ने भारत से डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति का अनुरोध किया है। बांग्लादेश ने विशेष रूप से डीजल की अतिरिक्त सप्लाई मांगी, जबकि श्रीलंका और मालदीव भी एनर्जी के सेक्टर में सहायता की मांग की थी। आइए, विस्तार से समझते हैं कि किन देशों ने भारत के खिलाफ क्या कदम उठाए थे और आज संकट के समय भारत उनकी किस तरह ढाल बन रहा है। मालदीव: 'इंडिया आउट' से 'इंडिया हेल्प' तक का सफर क्या थी बगावत? नवंबर 2023 में मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने 'इंडिया आउट' अभियान के दम पर सत्ता हासिल की थी। सत्ता में आते ही उन्होंने सबसे पहला काम मालदीव में तैनात भारतीय सैन्य कर्मियों को वापस भेजने का किया। ये कर्मी मुख्य रूप से मेडिकल इवैक्यूएशन के लिए वहां थे। मुइज्जू ने भारत पर आरोप लगाया कि भारतीय सैन्यकर्मी मालदीव की संप्रभुता का उल्लंघन कर रहे हैं। नवंबर 2023 में सत्ता संभालते ही मुइज्जू फरवरी 2024 तक सभी भारतीय सैन्यकर्मियों की वापसी का ऐलान कर दिया और मई 2024 तक सभी भारतीय सैनिक मालदीव छोड़ चुके थे। इसके बाद उन्होंने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत के बजाय चीन को चुना और बीजिंग के साथ कई रक्षा व आर्थिक समझौते किए। मालदीव के कुछ मंत्रियों ने भारतीय प्रधानमंत्री और भारतीयों पर आपत्तिजनक टिप्पणियां भी कीं, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया। हालांकि जब मुइज्जू को लगा कि चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है तो उन्होंने भारत का दौरा किया और भारत को 'सबसे भरोसेमंद साझेदार' बताया। वर्तमान संकट और भारत की मदद- मालदीव अपनी ऊर्जा और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। फरवरी 2026 के युद्ध के बाद वह गहरे संकट में घिर गया। जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से मालदीव में पेट्रोल-डीजल और गैस की भारी किल्लत हो गई। चीन की ओर से तत्काल राहत न मिलने पर मुइज्जू सरकार को अंततः नई दिल्ली का रुख करना पड़ा। भारत का कदम: सूत्रों की मानें तो भारत ने कूटनीतिक परिपक्वता दिखाते हुए मालदीव के लिए आवश्यक वस्तुओं के निर्यात को न सिर्फ जारी रखा, बल्कि आपातकालीन कोटे के तहत मालदीव को पेट्रोल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की विशेष खेप भेजी है, ताकि वहां का पर्यटन उद्योग और बुनियादी ढांचा पूरी तरह ठप न हो जाए। बांग्लादेश: सत्ता परिवर्तन और 'बहिष्कार' के बाद सच्चाई का सामना क्या थी बगावत? अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश में डॉ. मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ। इस सत्ता परिवर्तन के बाद बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतों का उदय हुआ और भारत विरोधी भावनाएं भड़काई गईं। वहां 'बॉयकॉट इंडिया' अभियान चलाकर भारतीय उत्पादों का बहिष्कार किया गया। यूनुस सरकार ने भारत के साथ कई पूर्व समझौतों (जैसे अडानी पावर डील) की समीक्षा करने की धमकी दी और सीमा व नदी जल बंटवारे को लेकर आक्रामक बयानबाजी की। सीमा पर भारत की बाड़बंदी रोक दी; BGB ने BSF को 'बैक टर्न' करने से इनकार कर दिया। यूनुस ने भारत के 'सेवन सिस्टर्स' (नॉर्थईस्ट) को 'लैंडलॉक्ड' बताते हुए चेतावनी दी कि अस्थिर बांग्लादेश भारत को प्रभावित कर सकता है। पाकिस्तान और चीन से संबंध मजबूत किए। यूनुस का मार्च 2025 चीन दौरा और 'ताइवान इंडिपेंडेंस' का विरोध। अल्पसंख्यक (हिंदू) हिंसा पर भारत की चिंता को 'बढ़ा-चढ़ाकर' बताया। लेकिन फरवरी के चुनाव के बाद सत्ता में आई तारिक रहमान के नेतृत्व वाली सरकार ने भारत के अच्छे संबंध बनाने की बात कही। वर्तमान संकट और भारत की मदद: ईरान युद्ध के कारण गैस सप्लाई रुकने से बांग्लादेश का पावर ग्रिड चरमरा गया है। देश के कपड़ा उद्योग, जो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, को बिजली और डीजल की भारी कमी के कारण बंद होने का खतरा पैदा हो गया। बांग्लादेश 95% तेल और 30% गैस मध्य पूर्व से आयात करता है। ईरान युद्ध से देश में LNG की कमी, पैनिक बाइंग और ईंधन राशनिंग शुरू हो गई। विश्वविद्यालय बंद, स्कूलों में छुट्टियां घोषित कर दी गईं। मार्च 2026 में बांग्लादेश ने भारत से डीजल मांगा। भारत का कदम: भारत ने नुमालीगढ़-पार्वतीपुर 'मैत्री पाइपलाइन' के जरिए हाई-स्पीड डीजल की आपूर्ति को बढ़ाकर बांग्लादेश की लाइफलाइन को जिंदा रखा है। इसके अलावा, भारतीय पावर ग्रिड से बांग्लादेश को दी जाने वाली बिजली आपूर्ति को बिना किसी बाधा के जारी रखा गया है, ताकि वहां मानवीय और आर्थिक संकट गहरा न हो। भारत ने 10 मार्च को 5,000 टन डीजल भेजा और अगले सप्ताह 10 हजार टन भेजा। इस महीने 40,000 टन का अतिरिक्त डीजल भेजने का प्लान है। MEA ने पुष्टि की कि बांग्लादेश का … Read more